“ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।” संत रविदास ने ऐसे राज्य की कल्पना की थी जहां सभी को भरपेट ...
“ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।”
संत रविदास ने ऐसे राज्य की कल्पना की थी जहां सभी को भरपेट भोजन मिले और साधारण जन तथा शक्तिशाली लोग समान रूप से रहें। यह केवल करुणा की अभिव्यक्ति नहीं थी; यह न्यायपूर्ण शासन का एक संक्षिप्त सिद्धांत था। उनकी दृष्टि में राजसत्ता की नैतिक सार्थकता भूख मिटाने, गरिमा की रक्षा करने और हर व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करने में निहित थी। इसीलिए उनकी कल्पना का बेगमपुरा, अर्थात् दुःख से मुक्त नगर, आज भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं से गहराई से जुड़ता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विकसित भारत की परिकल्पना आर्थिक प्रगति को सामाजिक समावेशन से जोड़कर इसी नैतिक आदर्श को आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में साकार करने का प्रयास है।
भक्ति आंदोलन के सर्वाधिक श्रद्धेय संतों में से एक संत रविदास ने इस धारणा को अस्वीकार किया कि जन्म किसी व्यक्ति का आध्यात्मिक मूल्य या सामाजिक दर्जा तय कर सकता है। परंपरागत रूप से चमड़े के काम से जुड़ी जाति में जन्म लेने के कारण वे अपने अनुभव के आधार पर श्रम के महत्व पर प्रामाणिकता से बात कर सके। लेकिन उनके विचार किसी एक जाति, क्षेत्र या धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं थे। उनके पद सिखों के पवित्र ग्रंथ, गुरुग्रंथ साहिब में शामिल हैं और उनका प्रभाव भाषा, क्षेत्र तथा संप्रदाय की सीमाओं से परे पहुंचा। उनकी रचनाओं में भक्ति, समानता और ईमानदार श्रम एक-दूसरे से अभिन्न थे: करुणा के बिना भक्ति खोखली थी और सद्गुणों के बिना प्रतिष्ठा का कोई नैतिक आधार नहीं था।
बेगमपुरा को अक्सर एक असंभव आदर्शलोक कहकर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन रविदास की कल्पना आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट थी: ऐसा समाज जहां पीड़ा, भय, बहिष्कार और अपमानजनक सीमाएं न हों; जहां किसी व्यक्ति की आने-जाने की स्वतंत्रता या उसकी गरिमा, जन्म से मिली सामाजिक स्थिति पर निर्भर न हो। उनकी कल्पना की यही स्थायी शक्ति आध्यात्मिक मुक्ति को सामाजिक मुक्ति की मांग से जोड़ती है। एक आधुनिक गणराज्य पंद्रहवीं शताब्दी की काव्यात्मक परिकल्पना को यंत्रवत किसी प्रशासनिक कार्यक्रम में नहीं बदल सकता, लेकिन वह स्वयं से वे प्रश्न पूछ सकता है जो रविदास ने उठाए थे: क्या आज भी कोई भूखा सोता है? क्या सामाजिक पहचान अब भी किसी व्यक्ति को अवसरों से वंचित करती है? क्या ईमानदार श्रम को आज भी सम्मान मिलता है? क्या सार्वजनिक संस्थाएं उन लोगों तक भी पहुंचती हैं जिनके पास न प्रभाव है, न विशेषाधिकार?
यहीं मोदी सरकार का शासन-दर्शन रविदास की नैतिक परिकल्पना से जुड़ता है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ इस विश्वास पर आधारित है कि विकास बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक तक पहुंचना चाहिए। हर पात्र परिवार को उसका हक मिलना चाहिए, राजनीतिक पहुंच के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि वह उसका अधिकार है। जन धन खातों और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने की व्यवस्था को राजनीतिक कृपा और बिचौलियों पर निर्भरता से निकालकर अधिक पारदर्शिता की ओर बढ़ाया है। यह उस पुरानी राजनीति से एक बड़ा बदलाव है जो सामाजिक न्याय की बात तो करती थी, लेकिन सबसे गरीब लोगों को बिचौलियों की दया पर छोड़ देती थी।
इस बदलाव का महत्व रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देता है। केंद्र सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत लगभग 81.35 करोड़ लाभार्थियों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराती है। स्वच्छ भारत, जल जीवन मिशन, उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास योजना और आयुष्मान भारत अभाव के अलग-अलग, लेकिन एक-दूसरे के पूरक पहलुओं को संबोधित करते हैं। शौचालय का संबंध निजता और सुरक्षा से है।
नल से जल की सुविधा गरीबों को पानी ढोने की शारीरिक मेहनत से बचाती है और उनका समय बचाती है। खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन का संबंध स्वास्थ्य से है। पक्का घर सुरक्षा और स्थिरता देता है, जबकि स्वास्थ्य बीमा परिवार को बीमारी के कारण कर्ज में डूबने के जोखिम से बचाने का साधन है। ये दान के कार्य नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार सरकार के दायित्वों का निर्वहन हैं, क्योंकि इनसे नागरिकों की गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीने की क्षमता बढ़ती है। कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हर पात्र व्यक्ति तक पहुंचाना सार्वजनिक नीति को संत रविदास के इस विश्वास के निकट लाता है कि बुनियादी मानवीय गरिमा पर केवल सामाजिक रूप से शक्तिशाली लोगों का एकाधिकार नहीं हो सकता।
श्रम की गरिमा संत रविदास के जीवन और आज की शासन-व्यवस्था के बीच एक और महत्वपूर्ण कड़ी है। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना मोचियों और जूते-चप्पल बनाने वाले कारीगरों सहित 18 पारंपरिक व्यवसायों के कारीगरों तथा शिल्पकारों को औपचारिक मान्यता, कौशल विकास, औजारों के लिए सहायता, रियायती दरों पर बिना जमानत ऋ ण, डिजिटल लेनदेन के लिए प्रोत्साहन और विपणन सहायता से जोड़ती है। इन सभी लाभों का मूल्य आंकड़ों में मापा जा सकता है, लेकिन उनका वास्तविक महत्व विरासत में मिले शिल्प-कौशल को उत्पादक ज्ञान के रूप में मान्यता देने और असुरक्षित स्वरोजगार को टिकाऊ उद्यम में बदलने के प्रयास में निहित है। कोई एक योजना पेशे से जुड़े पूर्वाग्रहों को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती, लेकिन सार्वजनिक नीति उन्हें बनाए रखने से इनकार कर सकती है। विकसित भारत को सृजन करने वाले हाथों को उतना ही महत्व देना होगा जितना निवेश की जाने वाली पूंजी को।
सामाजिक सशक्तीकरण के लिए सामूहिक स्मृति की पुनर्स्थापना भी आवश्यक है। वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2024 में लगभग 32 करोड़ रुपये के विकास कार्यों का शुभारंभ
प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कि ‘रविदास जी सबके हैं और सब रविदास जी के हैं’, हमारे हृदय में संत रविदास के स्थान को सटीक रूप से व्यक्त करता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सामाजिक न्याय और सभ्यतागत विरासत की पुनर्स्थापना की अवधारणा, संवैधानिक समानता तथा भारत की सुधारवादी आध्यात्मिक परंपराओं को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक शक्तियों के रूप में साथ लाती है
किया था और लगभग 62 करोड़ रुपये की लागत वाली संत रविदास संग्रहालय तथा पार्क सौंदर्यीकरण परियोजना की आधारशिला रखी थी। वहीं, मध्य प्रदेश के सागर में प्रधानमंत्री मोदी ने 2023 में 100 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले स्मारक परिसर की आधारशिला रखी थी। 11 एकड़ में फैले इस परिसर में मंदिर, संग्रहालय, दीर्घा और तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं शामिल हैं। फरवरी, 2026 में संत रविदास की 649वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री पंजाब स्थित डेरा सचखंड बल्लां गए और हवाई अड्डे का नाम ‘श्री गुरु रविदास महाराज जी एयरपोर्ट, आदमपुर’ रखा। इन कदमों ने भारत की राष्ट्रीय स्मृति में संत रविदास को आधिकारिक मान्यता दी और उनके योगदान को हाशिये से देश के सार्वजनिक जीवन के केंद्र में लाया।
प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कि ‘रविदास जी सबके हैं और सब रविदास जी के हैं’, हमारे हृदय में संत रविदास के स्थान को सटीक रूप से व्यक्त करता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सामाजिक न्याय और सभ्यतागत विरासत की पुनर्स्थापना की अवधारणा, संवैधानिक समानता तथा भारत की सुधारवादी आध्यात्मिक परंपराओं को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक शक्तियों के रूप में साथ लाती है। राष्ट्रीय स्मृति के हाशिये पर पड़े उपेक्षित व्यक्तित्वों को फिर से केंद्र में लाना न केवल लंबे समय से चली आ रही एक विसंगति को दूर करता है, बल्कि युवा भारतीयों को समानता, बंधुत्व और सेवा को समझने के लिए अपनी परंपराओं से उपजी वैचारिक शब्दावली भी प्रदान करता है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके अनुसूचित जाति मोर्चा (भाजपा एससी मोर्चा) ने 20 फरवरी, 2027 को पड़ने वाली संत रविदास की 650वीं जयंती के उपलक्ष्य में ‘संत रविदास समरसता संकल्प अभियान’ नामक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है। इसका शुभारंभ गुरु पूर्णिमा, 29 जुलाई, 2026 को वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास की जन्मस्थली पर हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत इस पवित्र स्थल की मिट्टी से भरे 131 कलशों के वितरण से हुई, जिन्हें उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों की यात्राओं पर ले जाया जाना था। इसमें 21,000 स्थानों पर कलश वंदन, 51,000 मंदिरों में दीप प्रज्वलन तथा सामूहिक आरतियां, गुरबानी पाठ, भजन संध्याएं और सामुदायिक आयोजन शामिल थे। 05 अक्टूबर से 05 नवंबर तक आयोजित होने वाली समरसता यात्रा जालंधर के डेरा सचखंड बल्लां को वाराणसी से जोड़ेगी। साथ ही, विद्यार्थियों को संत रविदास की शिक्षाओं से परिचित कराने के लिए 26 नवंबर से 15 जनवरी, 2027 तक छात्रावासों में संपर्क कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा। भाजपा इसे समानता, गरिमा और सामाजिक समरसता की उनकी शिक्षाओं को व्यापक जनविमर्श तथा सामुदायिक जीवन तक पहुंचाने का प्रयास बताती है। अभियान का समापन उनकी 650वीं जयंती पर होगा।
बेगमपुरा से विकसित भारत की यात्रा ने नई ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ गति पकड़ी है। कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को सांस्कृतिक मान्यता से जोड़कर मोदी सरकार ने संत रविदास के मूल्यों को नागरिक जीवन के रोजमर्रा के अनुभव का हिस्सा बनाया है। हर निर्मित घर, नल से जल पाने वाला हर परिवार, सशक्त हुआ हर कारीगर और पुनर्स्थापित किया गया हर ऐतिहासिक स्थल ऐसे भारत के संकल्प की पुष्टि करता है जहां गरिमा सभी को प्राप्त हो और अवसर जन्म के बजाय आकांक्षाओं से तय हों। यह सामाजिक न्याय, श्रम की गरिमा, सामाजिक समरसता और सभ्यतागत स्मृति का ऐसा समन्वय है जो ‘विकसित भारत’ की नैतिक आधारशिला बनता है। जैसे-जैसे विकास सामाजिक व्यवस्था के अंतिम छोर पर खड़े नागरिक तक पहुंचता है, बेगमपुरा एक काव्यात्मक आकांक्षा से आगे बढ़कर राष्ट्र के जीवन का वास्तविक अनुभव बनने लगता है। यही वह भारत है जिसकी कल्पना संत रविदास ने की थी और जिसके निर्माण के लिए प्रधानमंत्री मोदी प्रतिबद्ध हैं।
(लेखिका भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चे की राष्ट्रीय सोशल मीडिया प्रमुख और
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की सहायक प्राध्यापक हैं)
Courtesy: kamalsandesh
